"पुनर्जन्म"

*पुनर्जन्म*
आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित "भज गोविन्दम" स्तोत्र में "पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्" श्लोक है, जिसका अर्थ है "बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु, बार-बार माँ के गर्भ में शयन". यह श्लोक जन्म और मृत्यु के चक्र की पुनरावृत्ति और संसार की नश्वरता को दर्शाता है. 
मृत्यु के बाद शरीर तो मिट्टी हो जाता है और आत्मा का तो नया जन्म हो ही नहीं सकता क्योंकि आत्मा शाश्वत है, ना जन्म न मृत्यु ... आत्मा को नया शरीर धारण करना पड़ता है | तो  आत्मा को बार-बार शरीर क्यों धारण करना पड़ता है ... !!! 
असल में  मन....  आत्मा और शरीर के बीच की कड़ी है ..वही मन आगे यात्रा करता है ... नए-नए जन्म उसी के कारण लेने पड़ते हैं |यह जो पुनर्जन्म का सिद्धांत है यह मन के संदर्भ में ही लागू होता है आत्मा के संदर्भ में लागू नहीं होता |  इस मन में जन्मों-जन्मों के संस्कार संग्रहित होते हैं और इसी के हिसाब से यह तय होता है कि उसका अगला जन्म कैसा होगा ...कहां होगा... किस रूप में होगा | 
जब तक मन के संस्कार खत्म नहीं होंगे,,,  मन शून्य नहीं होगा ,,, तब तक जन्म-मरण का कुचक्र चलता ही रहेगा , तब तक मुक्ति नहीं हो सकती |
इसलिए किसी भी तरह की साधना का, तपश्चर्य का, भक्ति का ... अंतिम उद्देश्य इस मन को,  मन के संस्कारों को शून्य करना ही है , ताकि आवागमन के चक्र से छुटकारा हो सके और आत्मा का अपने मूल स्वरूप के साथ एकत्व हो सके I आत्मा का परमात्मा में विलय हो सके, जोकि शाश्वत आनंद का एकमात्र स्रोत है |
  
 ~मोहित हांडा 
   

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