"कर्ता और दृष्टा"
जन्म भी अपने हाथ में नहीं है और मृत्यु भी अपने हाथ में नहीं है l
बीच का जो सफर है , उसका वहम होता है कि इसमें किए जाने वाले कर्म मैं करता हूं l यह केवल मिथ्या अहंकार ( false ego, false self identification) मात्र है ।
पर इस जीवन का जो आधार है, जिसके ऊपर यह जीवन चलता है ; यहाँ तक कि हमारे श्वास ,,,,, जिनके बिना जीवन एक पल भी टिक नहीं सकता ..... वह भी खुद ब खुद चलते हैं ,,,, उसके साथ ही हम अपना कर्ता-पन नहीं जोड़ सकते ... तो बाकी सब में कर्ता-पन लगाना सबसे बड़ा वहम है l
इस प्रकार से हमारा सारा जीवन वास्तव में दृष्टा है ,,,, करता है ही नहीं l अपने भीतर के उस दृष्टा का साक्षात्कार करना , उस दृष्टा के साथ एक होना ही आत्म साक्षात्कार है l वही हमारी वास्तविक पहचान है ।
जिस प्रकार किसी अभिनेता के अभिनय के बाद अपने वास्तविक रूप में आने पर उसके किरदार से संबंधित सारे कर्म , सारे संबंध शून्य हो जाते हैं, ऐसे ही जब हमें अपनी वास्तविक पहचान हो जाती है , अपने स्वरूप का ज्ञान हो जाता है , तब इस मिथ्या अहंकार , इस माया के अधीन होकर किए जाने वाले कर्म भी कोई मायने नहीं रखते और इन कर्मों से मुक्ति ही मोक्ष है ,,,,, आनंद का द्वार है !!
🙏
~ मोहित हांडा
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